Wednesday, March 09, 2005

कभी बताना मुझे

कभी बताना मुझे ।

कैसा लगा था जब
बात ये दिल में आई थी
कि शायद चाहते हो मुझे
और पहली बार मैं भाई थी।

कभी बताना मुझे ।

कि कितने खुश हुए थे
जब मैं भी मुसकाई थी।
तुम्हारी धड़कनों की धुन
मेरे दिल ने भी गाई थी।

कभी बताना मुझे ।

कि वो कैसी मुस्कान थी
जो तुम्हारे चेहरे पर आई थी,
जब दरवाज़े की घंटी मेरा
छोटा सा तोहफ़ा लाई थी।

कभी बताना मुझे ।

कि क्या कभी यों ही
अचानक तुम तड़पे थे,
बेचैनी-सी छाई थी और
दिल के अरमाँ भड़के थे।

कभी बताना मुझे ।

कि कैसा लगा था लिखना
वो पहला ख़त मुझको।
जब लगा कि उड़कर पहुँच जाए
वो मुझतक, कैसे सँभाला ख़ुद को।

कभी बताना मुझे ।

कि क्या अब भी तुम
सपने वैसे बुनते हो।
और कभी टूटने से भी
क्या उनके तुम डरते हो?

कभी बताना मुझे ।

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