Wednesday, August 17, 2005

इतनी खुश थी मैं

कितनी खुश हूँ इसका अहसास ही नहीं हुआ
इतनी खुश थी मैं।
याद दिलाया तुमने पर विश्वास ही नहीं हुआ
इतनी खुश थी मैं।

बच्चों के से खिलवाड़ मुझे आ रहे थे रास
इतनी खुश थी मैं।
बेमतलब की बातें भी लग रहीं थीं ख़ास
इतनी खुश थी मैं।

बंद कमरा भी खुला आसमान बन गया था
इतनी खुश थी मैं।
तुम्हारी आँखों से ही पूरा जहान बन गया था
इतनी खुश थी मैं।

Friday, August 12, 2005

क्यों चुप हूँ मैं

पूछा न करो मुझसे कि क्यों चुप हूँ मैं।

कभी सुना है फूलों को बोलते
देखा है तारों को मुँह खोलते?
रंग और रोशनी जो छाई हुई है
बिना कहे सुने ही कितनी खुश हूँ मैं।

पूछा न करो मुझसे कि क्यों चुप हूँ मैं।

Monday, August 01, 2005

कौन सा है आसमान जिसमें उड़ रही हूँ मैं

कौन सा है आसमान जिसमें उड़ रही हूँ मैं
कौन डगर जिससे कि पीछे ना मुड़ रही हूँ मैं।

गीत बन के बिखरे जो शब्द हैं हवाओं में
लाया मेरे पास कौन कि बन सुर रही हूँ मैं।

प्रिय की बाँहों में कहीं वसंत-सा कुछ है सही
ग्रीष्म की तपिश में बन फूल झड़ रही हूँ में।

सावन ने उनकी आँखों में घर शायद कर लिया
तभी तो यों घनघोर घटाओं-सी उमड़ रही हूँ मैं।

Sunday, July 24, 2005

डर नहीं है बिछड़ने का भी ऐ सनम

डर नहीं है बिछड़ने का भी ऐ सनम,
ले भी गया मुझे कोई तो क्या वो पाएगा?
क्या था मेरे पास जो तुम्हें न दे दिया
हार कर वो खुद ही मुझे लौटा जाएगा।

रहे नहीं वो दिन कि हर एक गुलशन में
फूल दिल का खिलने के क़ाबिल होता हो,
छूट गई दुनिया जहाँ मन का उड़ता पंछी
तेज दौड़ने से कभी हासिल होता हो।

आशियाना मिल गया है, मिल गए दाने
निकला बाहर उनसे तो फिर जी न पाएगा।
आब-ए-जन्नत मिल गई है इस दिल को
और अब वो सादा पानी पी न पाएगा।

Wednesday, July 20, 2005

हाँ, कहा तो था तुमने साथी

हाँ, कहा तो था तुमने साथी।

कि मुश्किल होंगी राहें अपनी
फेरना मत निग़ाहें अपनी।
निग़ाहों को समझा लूँ पर दिल का क्या करूँ,
मारती हैं जिसे सज़ाएँ अपनी।

हाँ, कहा तो था तुमने साथी।

कि मूँदनी पड़ेंगी हमें आँखें अपनी
नहीं समझेंगे वो बातें अपनी।
पर दुनिया भी खींचती है क्या करूँ उसका,
कहाँ भेजूँ परेशान रातें अपनी।

हाँ, कहा तो था तुमने साथी।

कि बिना आस के ही चलना पड़ेगा
बेचैनियों में जीना-मरना पड़ेगा।
पर बर्दाश्त नहीं होती बेचैनी, आस नहीं मरती,
कहो कब तक उन्हें कुचलना पड़ेगा?

हाँ, कहा तो था तुमने साथी।