मुझे चाँद ना कहा करो महबूब मेरे।
क़िस्मत में लिखा है उसकी
बस अकेले यों ही रहना।
तारे तमाशा देखते दूर से, उसे
दर्द अपना खुद ही है सहना।
क्या करे अगर कभी उदासियाँ उसे घेरें?
मुझे चाँद ना कहा करो महबूब मेरे।
उसकी चाँदनी में यों तो
ठंढक दुनिया सारी पाती है।
पर उसकी ठंढी आहें कहाँ
किसी के दिल को तड़पाती हैं?
ले कहाँ पाया कभी वो प्रियतम के संग फेरे।
मुझे चाँद ना कहा करो महबूब मेरे।
Monday, June 27, 2005
Thursday, June 23, 2005
हम दो साथी आशा से हीन
हम दो साथी आशा से हीन।
मंज़िल अपनी हो सकती नहीं
फिर भी चाहत है बढ़ने की।
मंज़िल ही तो छिन सकती है
रास्ता कौन लेगा छीन?
हम दो साथी आशा से हीन।
इज़ाज़त नहीं है रुकने की,
बाँहों में तुमको भरने की।
बस हाथ पकड़ चलते हैं
जब तक साँसें न हो जाएँ क्षीण।
हम दो साथी आशा से हीन।
मंज़िल अपनी हो सकती नहीं
फिर भी चाहत है बढ़ने की।
मंज़िल ही तो छिन सकती है
रास्ता कौन लेगा छीन?
हम दो साथी आशा से हीन।
इज़ाज़त नहीं है रुकने की,
बाँहों में तुमको भरने की।
बस हाथ पकड़ चलते हैं
जब तक साँसें न हो जाएँ क्षीण।
हम दो साथी आशा से हीन।
Wednesday, June 15, 2005
सच ही कहा था उन्होंने
सच ही कहा था उन्होंने
आसान नहीं होतीं
मोहब्बत की ये राहें।
पागलपन नहीं रुकता
लाख किसी के चाहे।
सम्भाले नहीं सम्भलता
बेचैन होता मन।
दिमाग़ की नहीं सुनती
तेज़ होती धड़कन।
समय के साथ नहीं भरता
घाव कभी दिल का।
उलटा हर पल इसे
दर्द नया है मिलता।
बेचैनियाँ भी दिल कीं
एक हद के बाद।
लफ़्ज़ों में हो ना पातीं
ज़ाहिर हैं साफ़-साफ़।
आँखें ही नहीं खुलतीं
हों सामने वो ना ग़र।
पर नींद नहीं आती
भूले-से भी पलकों पर।
फिर भी रोककर के
अपने पागलपन को,
रौंद कर चिल्लाती
हुई एक धड़कन को,
दबाकर सिसकियों को
बेचैनियों को मार,
सोख आँसुओं को
कर के दिलपर वार,
खोलनी पड़ती हैं
सुरज के संग आँखें,
चलना पड़ता है दिनभर
ज़िम्मेदारियों को लादे।
सुन ना पाए कोई
भूल से भी आहें।
आसान नहीं होतीं
मोहब्बत की ये राहें।
सच ही कहा था उन्होंने।
आसान नहीं होतीं
मोहब्बत की ये राहें।
पागलपन नहीं रुकता
लाख किसी के चाहे।
सम्भाले नहीं सम्भलता
बेचैन होता मन।
दिमाग़ की नहीं सुनती
तेज़ होती धड़कन।
समय के साथ नहीं भरता
घाव कभी दिल का।
उलटा हर पल इसे
दर्द नया है मिलता।
बेचैनियाँ भी दिल कीं
एक हद के बाद।
लफ़्ज़ों में हो ना पातीं
ज़ाहिर हैं साफ़-साफ़।
आँखें ही नहीं खुलतीं
हों सामने वो ना ग़र।
पर नींद नहीं आती
भूले-से भी पलकों पर।
फिर भी रोककर के
अपने पागलपन को,
रौंद कर चिल्लाती
हुई एक धड़कन को,
दबाकर सिसकियों को
बेचैनियों को मार,
सोख आँसुओं को
कर के दिलपर वार,
खोलनी पड़ती हैं
सुरज के संग आँखें,
चलना पड़ता है दिनभर
ज़िम्मेदारियों को लादे।
सुन ना पाए कोई
भूल से भी आहें।
आसान नहीं होतीं
मोहब्बत की ये राहें।
सच ही कहा था उन्होंने।
Wednesday, May 11, 2005
रूठा ना करो
रूठा ना करो इन सवालों पर,
पागल दिल के बेचैन ख़यालों पर।
जो एक बार तुमसे पूछा,
सौ बार पहले ख़ुद से पूछा।
तुमसे पूछ कर मैंनें
बस मरहम तुम्हारे साथ का
लगाया दिल के छालों पर।
रूठा ना करो इन सवालों पर।
पागल दिल के बेचैन ख़यालों पर।
जो एक बार तुमसे पूछा,
सौ बार पहले ख़ुद से पूछा।
तुमसे पूछ कर मैंनें
बस मरहम तुम्हारे साथ का
लगाया दिल के छालों पर।
रूठा ना करो इन सवालों पर।
Sunday, May 01, 2005
समर्पण
लिख पाती ऐसा गीत कोई
सब मन की बातें कह जाता।
और फिर उनसे कहने को
और नहीं कुछ रह जाता।
शब्द कुछ ऐसे होते
दिल निकाल कर रख सकते।
एक निग़ाह ऐसी जिसमें
सारा जी हम भर सकते।
होता आलिंगन कोई ऐसा,
आग सारी बुझ जाती।
कोई चुम्बन होता जिसमें
सारी साँसें चुक जाती।
ऐसा कोई मिलन भी होता,
पल भर में जो हो जाता,
और तड़प, इच्छाएँ बाकी
के जीवन की धो जाता।
कुछ होता मिल जाता उनको
मेरे मन का पूरा दर्पण।
संस्कार कोई ऐसा कि
हो जाता सम्पूर्ण समर्पण।
सब मन की बातें कह जाता।
और फिर उनसे कहने को
और नहीं कुछ रह जाता।
शब्द कुछ ऐसे होते
दिल निकाल कर रख सकते।
एक निग़ाह ऐसी जिसमें
सारा जी हम भर सकते।
होता आलिंगन कोई ऐसा,
आग सारी बुझ जाती।
कोई चुम्बन होता जिसमें
सारी साँसें चुक जाती।
ऐसा कोई मिलन भी होता,
पल भर में जो हो जाता,
और तड़प, इच्छाएँ बाकी
के जीवन की धो जाता।
कुछ होता मिल जाता उनको
मेरे मन का पूरा दर्पण।
संस्कार कोई ऐसा कि
हो जाता सम्पूर्ण समर्पण।
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